बावनी इमली व पारिजात के साथ वट वृक्ष को मिला विरासत वृक्ष का मुकाम*

*बावनी इमली व पारिजात के साथ वट वृक्ष

को मिला विरासत वृक्ष का मुकाम*

फतेहपुर। सदियों के साक्षी जिले के चार पेड़ों को शुक्रवार को प्रदेश सरकार ने विरासत वृक्ष घोषित कर दिया। राज्य जैव विविधता बोर्ड की ओर से जिन पेड़ों को यह उपाधि दी गई है उनमें बिंदकी-खजुहा के बीच में शहीद स्मारक के रूप में प्रसिद्ध बावनी इमली का पेड़, खागा तहसील के सरौली के जंगल में स्थित दो पारिजात के वृक्ष और शहर के डाकबंगला में स्थित बरगद का वृक्ष शामिल है। इन वृक्ष स्थलों को पर्यटन के लिहाज से भी विकसित किया जाएगा।

बावनी इमली स्थल को पर्यटक स्थल का दर्जा तो पहले से ही मिला हुआ है। यहां पर स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस को प्रशासनिक अधिकारी भी झंडारोहण करने जाते हैं। इस इमली के पेड़ की उम्र 350 से 400 वर्ष पुरानी आंकी गई है। इसी प्राचीनता के आधार पर वृक्ष को विरासत वृक्ष की सूची में रखा गया है। वहीं, खागा तहसील के सरौली गांव के पास दो पारिजात के पुराने पेड़ खड़े हैं।

यह दोनों पेड़ कितने पुराने हैं, इसका आंकलन वन विभाग भी सही से नहीं कर पा रहा है। बस सैकड़ों वर्ष पुराने पेड़ बता रहा है। वहीं, आसपास के गांवों के बुजुर्गों का कहना है कि जब वह छोटे थे, तो दादा-बाबा बताते थे कि यह पेड़ इतने ही बड़े उनके बचपन से हैं। ग्रामीणों की इन्हीं बातों से अंदाजा लगाया जा रहा है कि यह दोनों पेड़ 450 से 500 वर्ष पुराने हैं। इसी प्रकार आबूनगर डाकबंगला में बरगद के पेड़ को विरासत वृक्ष को दर्जा मिला है।
52 क्रांतिकारियों की शहादत की गवाह है बावनी इमली
बिंदकी। 52 क्रांतिकारियों की शहादत का गवाह बावनी इमली का पेड़ वर्तमान में भी अपने अतीत के गौरव की कहानी कह रहा है। शहीदों की याद दिलाने वाली इस जगह को न तो ठीक से संवारा गया है और न ही इस बूढ़े पेड़ की देखरेख के पुख्ता इंतजाम किए गए। विरासत सूची में शामिल होने के बाद इस ऐतिहासिक स्थल के दिन बहुरने की उम्मीद दिखाई देने लगी है।
इसी इमली के पेड़ से क्रांतिकारी ठाकुर जोध सिंह ने अपने क्रांतिकारी साथियों के साथ गोरिल्ला युद्ध की शुरूआत की थी। अवध एवं बुंदेलखंड के क्रांतिकारियों को एक सूत्र में बांधकर संगठित किया था। जोधा सिंह और उनके साथी ने 27 अक्तूबर 1857 को महमूदपुर गांव में एक दरोगा और एक अंग्रेज सिपाही को घेरकर मार दिया था। गोरिल्ला कार्रवाई का खजुहा प्रमुख स्थान हुआ करता था।
चारों ओर से आने-जाने की सुविधा होने के कारण अक्सर क्रांतिकारी यहां पर एकत्र होकर क्रांति की अलख जगाने पहुंचते थे। इस बात की जानकारी कर्नल कैंपवेल को हुई। उनके निर्देश पर कर्नल पावेल ने क्रांतिकारियों के दल पर हमला कर दिया, लेकिन क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों को मुंहतोड़ जवाब देते हुए कर्नल पावेल को मौत के घाट उतार दिया था। अंग्रेजी हुकूमत इस हमले से झल्ला उठी। जोधा सिंह 28 अप्रैल 1858 को अर्गल के राजा गणपत सिंह से मिलकर अपने 51 साथियों के साथ लौट रहे थे।
तभी कर्नल क्रिस्टाइल की घुड़सवार सेना ने उन्हें घोरहा गांव के पास बंदी बना लिया। जिला मुख्यालय से लगभग 30 किमी पश्चिम मुगल रोड पर स्थित इस इमली के पेड़ पर 52 क्रांतिकारियों को उसी दिन सामूहिक रूप से फांसी पर लटका दिया गया था। इन्हीं शहीदों की याद में इस पेड़ को बावन इमली के नाम से पहचाना जाने लगा। अब 21वीं सदी में बावन इमली को विरासत के रूप में घोषित कर दिए जाने से इसके इतिहास को प्रदेश और देशभर में ख्याति मिलेगी।